रण की गाथा

युद्ध की रणभेरी बजी, ह्रदय में उठी आग,धरती कांपी वीरों से, नभ में गूंजे राग।धूल में लिपटे स्वाभिमान, आंखों में था जोश,हर एक सैनिक बना चला, ले विजय का होश।

सीने पर चलती तलवारें, पर न रुकते पांव,मृत्यु भी जिसको ना डिगाए, वो होता है ठांव।लहू से सींचे जाते हैं, इतिहासों के पन्ने,युद्ध नहीं बस रक्तरंजित, होते हैं इसमें सपने।

धरती माँ की गोदी में, बलिदानों की गाथा,हर बूंद में बसी हुई, एक अमर विराथा।नभ से गिरे अंगारे भी, जब रणबांकुरों ने साधे,दुश्मन कांपे छांव में भी, जब उनके रथ आगे।

युद्ध नहीं है केवल क्रोध, यह धर्म की पीर,न्याय की राहों में चलता, हर सच्चा रणवीर।माँ की लोरी छूट गई, भाई की मुस्कान,पर आँखों में सपना वही, लाऊं अपनी शान।

शंख बजे और वीर बढ़े, ना सोचे क्या होगा,जीत मिले या मृत्यु ही, बस भारत ही रोशन होगा।केसरिया लहराया जब, रक्त से भिगा आँचल,तब जाकर इतिहास ने लिखा, ये वीरों का संग चल।मां बहनों की आंखों में, छलक पड़ा अभिमान,उनकी राखी को मिला, अमरता का सम्मान।वीरगति को प्राप्त हुआ जो, वो अमर कहाया,उसका नाम ही बन गया, भारत का साया।

युद्ध नहीं बस शस्त्रों की बात, ये आत्मा का स्वर,जो लड़े सच्चे मन से, वो कहलाए अमर।वीरों की चिताओं पर, जलते हैं दीप हजार,युद्ध नहीं विस्मृति है, यह गौरव का संसार।

हर प्रहार में होती है, एक कथा पुरानी,जहां मिट जाते हैं सब नाम, पर रहती वीर कहानी।जब रणबांकुरे आगे बढ़ते, धड़कन भी रुक जाती है,

तब जाकर धरती माँ की मुस्कान लौट आती है।

सुनीता गुप्ता

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